ज़िंदगी का जुआ
When life becomes a wager, we often lose what already matters. A reflective poem on desire, loss, self-deception, and the courage to fight one’s own Kurukshetra.
ज़िंदगी, तुम अपनी ही ज़िंदगी को दांव पर लगाकर खेलते हो। थोड़ा पाने की चाह में पूरा जीवन रख देते हो। हाथ में जो है उसे भी गँवा देते हो। हे ज़िंदगी के जुआरी, इतना तो समझो— जो तुम्हारा है, पहले उसकी कीमत पहचानो। जो नहीं है, उसकी प्यास में मत डूबो। इतना गणित तो सरल है— थोड़ा पाने के लिए पूरा नहीं खोया जाता। वरना अंत में हाथ में बस “थोड़ा” ही बचता है।




